★★घुस के जमाने बा★★
{कविता के माध्यम से समझने की कोशिश}
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मुंह मत देख फेंक, घूस के जमाना बा।
मर्द हाक़िम लेता, लेता हाक़िम जे जनाना बा।
मूँह मत देख फेंक, घूस के जमाना बा।
रोके द, गाके द, खेत-बाड़ी गंवाके द
कहीं से चोराके द, इज्जति लुटाके द
द ज़रूर द
काहेकि, टारे के ढेर बहाना बा।
मुंह मत देख फेंक, घूस के जमाना बा।
अन्हरा बा, कनहा बा, लंगड़ा बा, बहीड़ा बा।
घूस सबका चाहीं, जे ऑफिस बा।
ऑफिस में हर केहू, अफ़सर बा, अफसराना बा।
मुंह मत देख फेंक, घूस के जमाना बा।
घूस थाना में चाहीं, अदालत में चाहीं
हाज़त में चाहीं, वक़ालतख़ाना में चाहीं
ई कहीं, पेशगी बा, ख़ुशनामा बा।
आ कहीं नज़राना बा।
मुंह मत देख फेंक, घूस के ज़माना बा।
जय हिंद, जय भारत, मेरा भारत महान